एजेंसी, तेहरान। Strait of Hormuz Shipping : पश्चिम एशिया में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान ने वैश्विक स्तर पर एक बेहद कड़ा और चेतावनी भरा ऐलान किया है। ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि अब वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से दुश्मन देशों के हथियारों और किसी भी तरह के सैन्य उपकरणों को गुजरने की इजाजत बिल्कुल नहीं देगा। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते रणनीतिक टकराव के बीच तेहरान ने इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना कड़ा नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक बिल्कुल नया और बेहद सख्त समुद्री नियंत्रण तंत्र तैयार कर लिया है। इस कड़े कदम से इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर नए सिरे से एक बड़ा विवाद खड़ा होने की आशंका गहरा गई है।
BREAKING: Iran says ‘enemy’ weapons shipments will not be allowed to transit through Strait of Hormuz
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— Al Jazeera Breaking News (@AJENews) May 17, 2026
ईरान ने तैयार किया नया समुद्री नियंत्रण तंत्र
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अजीज़ी ने इस नए घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात को पूरी तरह से नियंत्रित और संचालित करने के लिए एक बेहद पेशेवर तंत्र तैयार किया है। इस नए सिस्टम के अंतर्गत समुद्र के भीतर एक विशेष और निर्धारित मार्ग का निर्माण किया जाएगा, जिसकी आधिकारिक घोषणा बहुत जल्द ही दुनिया के सामने कर दी जाएगी। ईरान के प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि इस नई व्यवस्था और सुरक्षात्मक मार्ग का सीधा फायदा केवल आम कार्गो जहाजों और ईरान के साथ रणनीतिक व कूटनीतिक सहयोग करने वाले मित्र देशों को ही मिलेगा।
‘फ्रीडम प्रोजेक्ट’ और अमेरिकी जहाजों पर लगेगी पूर्ण रोक
ईरान की इस नई और सख्त घोषणा के तहत अमेरिका के नेतृत्व में चलाए जा रहे ‘फ्रीडम प्रोजेक्ट’ यानी अमेरिकी ऑपरेटरों और उनके सहयोगी देशों से जुड़े जहाजों को इस नए समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करने से पूरी तरह से रोक दिया जाएगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह इस जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने वाले जहाजों को दी जाने वाली विशेष सुरक्षा सेवाओं के बदले में एक निश्चित शुल्क भी वसूलेगा। ईरान के इस आक्रामक रुख से साफ़ है कि वह इस बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक गलियारे पर अपना पूरा एकाधिकार और संप्रभुता स्थापित करना चाहता है, जो अमेरिका को एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।
कड़े फैसले के पीछे ईरान ने दी अपनी पुरानी दलील
इस कड़े और अप्रत्याशित फैसले के पीछे की वजह बताते हुए ईरान के वरिष्ठ अधिकारी मोहम्मद रजा आरिफ ने कहा कि अतीत में ईरान ने अपनी संप्रभुता के अधिकारों और वैश्विक व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए सीमा नियमों में थोड़ी ढील दी थी। इसी ढील का फायदा उठाकर दुश्मन देशों ने इस जलमार्ग से उन सैन्य उपकरणों और हथियारों की आवाजाही की, जिनका इस्तेमाल बाद में खुद ईरान के खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी के लिए किया गया। ईरान के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि अब समय पूरी तरह बदल चुका है और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालकर ऐसी किसी भी गलती को दोबारा दोहराने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के नियंत्रण का किया बड़ा दावा
दूसरी तरफ, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी हालिया चीन यात्रा पूरी करने के बाद एक बड़ा और पलटवार करने वाला दावा किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हवाई जहाज में पत्रकारों से विशेष बातचीत के दौरान कहा कि असल में अमेरिका ही होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से नियंत्रित करता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अमेरिकी रुख से पूरी तरह सहमत हैं कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने चाहिए और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हित में होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह आंकड़ा भी सामने रखा कि अमेरिकी नौसेना द्वारा की गई कड़क नाकेबंदी के कारण पिछले कुछ हफ्तों में ईरान को हर दिन लगभग 50 करोड़ डॉलर का भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजार पर मंडराया संकट
गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी दुनिया का सबसे संवेदनशील और सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग माना जाता है, क्योंकि दुनिया भर में होने वाली कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में ईरान और अमेरिका की इस ताजा सैन्य बयानबाजी और प्रतिबंधों के कारण दुनिया भर के ऊर्जा बाजार और कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर भारी उछाल आने का खतरा पैदा हो गया है। इसी साल फरवरी के महीने में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त सैन्य हमलों के बाद से ही इस पूरे क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। हालांकि, इसके बाद अप्रैल के महीने में दोनों पक्षों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति जरूर बनी थी, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह शांति समझौता अब पूरी तरह से टूटता हुआ नजर आ रहा है।
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