एजेंसी, दिल्ली। Unnao Case : उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उन्नाव दुष्कर्म मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा के निलंबन को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया है जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा पर रोक लगा दी गई थी। इस फैसले के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि कुलदीप सिंह सेंगर फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे ही रहेगा। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में दायर मुख्य याचिका पर नए सिरे से विचार करे।
Supreme Court sets aside Delhi High Court order, which had suspended the life sentence of former MLA Kuldeep Singh Sengar in the 2017 Unnao rape case. Earlier, Supreme Court had stayed the order on an appeal filed by the CBI in the matter.
A bench of CJI Surya Kant and Justice… pic.twitter.com/Z4ztyETP3U
— ANI (@ANI) May 15, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को दिए सख्त निर्देश
भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। पीठ ने कहा है कि उच्च न्यायालय सेंगर की दोषसिद्धि और उम्रकैद के खिलाफ दायर मुख्य याचिका पर आगामी दो महीने के भीतर फैसला करने का प्रयास करे। यदि मुख्य याचिका पर शीघ्र निर्णय लेना संभव न हो, तो ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू होने से पहले सजा को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर आदेश पारित किया जाए। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर अपनी कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।
जन आक्रोश और सुरक्षा के मद्देनजर रद्द हुई जमानत
इससे पहले, जब उच्च न्यायालय ने कुलदीप सेंगर को जमानत देने का आदेश दिया था, तब देश के विभिन्न हिस्सों में भारी जन आक्रोश देखने को मिला था। समाज के विभिन्न वर्गों, कार्यकर्ताओं और पीड़िता के परिवार ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया था। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल दिसंबर में ही उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी थी। शुक्रवार को हुई सुनवाई में अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु भी उठाया है कि क्या किसी विधायक को पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत सुनवाई के दौरान ‘लोक सेवक’ माना जा सकता है या नहीं।
लोक सेवक की परिभाषा पर कानूनी उलझन
यह पूरा विवाद दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश से शुरू हुआ था जिसमें कहा गया था कि निर्वाचित प्रतिनिधि भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने सेंगर की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया था। अदालत का तर्क था कि सेंगर पहले ही सात साल और पांच महीने की सजा काट चुका है। हालांकि, सीबीआई और अन्य पक्षों ने इस दलील को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद अब सजा को बरकरार रखने का निर्णय लिया गया है।
पीड़िता और न्याय व्यवस्था की जीत
उन्नाव कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, जिसमें एक नाबालिग के साथ हुए जघन्य अपराध में रसूखदार नेता का नाम सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा रुख को पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि गंभीर अपराधों के मामलों में किसी भी प्रकार की कानूनी तकनीकी खामी का लाभ दोषियों को आसानी से नहीं मिलना चाहिए। अब सबकी नजरें दिल्ली उच्च न्यायालय पर टिकी हैं, जिसे दो महीने के भीतर इस पर विस्तृत फैसला सुनाना है।
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