एजेंसी, धार/इंदौर। Bhojshala Verdict : मध्य प्रदेश के बहुचर्चित धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने मंगलवार को इस मामले के सभी संबंधित पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। करीब छह सप्ताह से अधिक समय तक चली इस नियमित सुनवाई के बाद अब पूरे देश की नजरें अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।
#WATCH | Indore, Madhya Pradesh: On the Dhar Bhojshala hearing, Noor Ahmed, lawyer of Muneer and Farooque, says, “In the rejoinder, we submitted that, during the previous hearing, the argument done by the government, we said that the government, ASI, is an independent agency.… pic.twitter.com/E7ghZ5rZmi
— ANI (@ANI) May 12, 2026
एएसआई की 2000 पन्नों की रिपोर्ट और 98 दिनों का सर्वे
इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। एएसआई ने कोर्ट के आदेश पर भोजशाला परिसर में लगातार 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया था। इस दौरान परिसर की अत्याधुनिक मैपिंग, वीडियोग्राफी और पुरातात्विक अवशेषों की सूक्ष्म जांच की गई। एएसआई ने अदालत के समक्ष लगभग दो हजार पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है, जिसमें परिसर की संरचना से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्यों का खुलासा किया गया है।
हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्ष के अपने-अपने दावे
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने तीन प्रमुख दावे पेश किए गए:
हिंदू पक्ष: हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने मजबूती से दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है। उन्होंने साक्ष्य के रूप में स्तंभों की बनावट, प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष और ऐतिहासिक दस्तावेजों को पेश करते हुए यहां नियमित पूजा का अधिकार मांगा।
मुस्लिम पक्ष: मुस्लिम पक्ष ने इस स्थल को कमाल मौला मस्जिद बताते हुए अपनी धार्मिक परंपराओं का हवाला दिया। उन्होंने एएसआई के सर्वे को पक्षपातपूर्ण बताते हुए उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए और कहा कि रिपोर्ट में कई तथ्यों को एकतरफा तरीके से दिखाया गया है।
जैन पक्ष: इस बार विवाद में जैन समाज ने भी एक नया मोड़ ला दिया है। जैन पक्ष ने दावा किया कि परिसर का इतिहास उनकी परंपराओं से भी जुड़ा है। उन्होंने लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को देवी सरस्वती बताया जा रहा है, उसे जैन देवी ‘अंबिका’ की प्रतिमा होने का दावा किया और इसके समर्थन में प्रमाण भी प्रस्तुत किए।
अदालत का गहन अध्ययन और सुरक्षित फैसला
हाई कोर्ट की डबल बेंच ने एएसआई की तकनीकी रिपोर्ट, वीडियोग्राफी और सभी पक्षों द्वारा जमा किए गए प्राचीन साक्ष्यों का गहराई से अवलोकन किया है। 6 अप्रैल से शुरू हुई इस नियमित सुनवाई में हर पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया गया। लंबी बहस और ऐतिहासिक प्रमाणों की समीक्षा के बाद अदालत ने फैसला लिखने के लिए सुरक्षित रख लिया है। अब यह निर्णय तय करेगा कि धार की इस ऐतिहासिक धरोहर का भविष्य क्या होगा और वहां धार्मिक अधिकारों की स्थिति क्या रहेगी।
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