सुप्रीम कोर्ट

सबरीमाला विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा तीखा सवाल : जो श्रद्धालु नहीं हैं उन्हें मंदिर की परंपराओं को चुनौती देने का हक कैसे? 

देश/प्रदेश नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर सुप्रीम कोर्ट : सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और वहां की सदियों पुरानी परंपराओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से एक बहुत ही बुनियादी और महत्वपूर्ण सवाल पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त ही नहीं हैं, वे उस मंदिर की मान्यताओं और प्रथाओं को अदालत में चुनौती कैसे दे सकते हैं। अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सात मुख्य सवालों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति जनहित याचिका के जरिए किसी विशेष धार्मिक समूह की परंपराओं में दखल दे सकता है।

भक्तों की अनुपस्थिति और याचिकाकर्ताओं की पहचान पर चर्चा

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि इस मामले को अदालत तक लाने वाले मूल लोग कौन थे। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मंदिर की प्रथा को चुनौती देने वाला कोई भी व्यक्ति भगवान अयप्पा का भक्त नहीं था। जब यह जानकारी सामने आई कि याचिकाकर्ता वकीलों का एक संगठन है, तो अदालत ने सवाल किया कि क्या ऐसा कोई व्यक्ति याचिका दायर कर सकता है जिसका उस मंदिर या संप्रदाय से कोई सीधा संबंध न हो। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस बिंदु पर पारदर्शिता जरूरी है कि क्या अदालत को ऐसे गैर-भक्तों की याचिकाओं पर सुनवाई करनी चाहिए।

अंधविश्वास और न्यायिक समीक्षा पर तीखी बहस

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि कोई भी सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक परंपरा को सिर्फ अंधविश्वास बताकर खारिज नहीं कर सकती, क्योंकि भारत एक विविधतापूर्ण देश है और एक के लिए जो परंपरा है वह दूसरे के लिए अंधविश्वास हो सकता है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति है जिससे वह यह देख सकती है कि क्या कोई प्रथा समाज के लिए गलत है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि सती प्रथा या नरबलि जैसे गंभीर मामलों में तो दखल दिया जा सकता है, लेकिन सामान्य धार्मिक मामलों में तर्क और विज्ञान को उस तरह से लागू नहीं किया जा सकता जैसे अन्य कानूनी मामलों में किया जाता है।

सामाजिक सुधार और धर्म की पहचान का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म के मूल स्वरूप या उसकी पहचान को खत्म नहीं किया जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी भी प्रथा की जांच उसी धर्म की सोच और इतिहास के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से। वर्तमान में 9 जजों की संविधान बेंच इस मामले से जुड़ी 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। यह कानूनी लड़ाई पिछले 26 वर्षों से चल रही है और अब अदालत महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक सही संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

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