एजेंसी, इंदौर। मध्य प्रदेश में प्रशासनिक पदों पर तैनातियों को लेकर इंदौर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि सरकारी विभागों में ऊंचे पदों पर नियुक्तियां केवल वरिष्ठता (सीनियरिटी) के आधार पर ही की जाएंगी। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल पदनाम (डेजिग्नेशन) मिल जाने को वरिष्ठता का पैमाना नहीं माना जा सकता। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने यह फैसला इंदौर के प्रतिष्ठित माता जीजाबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय (ओल्ड जीडीसी) में प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद पर सुनवाई करते हुए दिया।
प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति पर विवाद और अदालती दखल
यह पूरा मामला जून 2025 में शुरू हुआ था, जब कॉलेज के नियमित प्राचार्य रिटायर हुए थे। उस समय वरिष्ठता सूची में ऊपर होने के बावजूद डॉ. मंजू शर्मा को नजरअंदाज कर दिया गया और प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी डॉ. अशोक सचदेवा को सौंप दी गई। उच्च शिक्षा विभाग ने जुलाई 2025 में डॉ. सचदेवा की नियुक्ति के आदेश जारी किए थे। इस फैसले के खिलाफ डॉ. मंजू शर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपनी वरिष्ठता के प्रमाण पेश किए।
वरिष्ठता बनाम पदनाम की कानूनी जंग
सुनवाई के दौरान डॉ. मंजू शर्मा ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति 12 सितंबर 1983 को सहायक प्राध्यापक के रूप में हुई थी और साल 2006 में वे पदोन्नत होकर प्रोफेसर बनीं। वहीं, डॉ. सचदेवा की नियुक्ति उनके बाद हुई थी और उन्हें साल 2018 में केवल प्रोफेसर का पदनाम दिया गया था। दूसरी ओर, डॉ. सचदेवा के वकीलों ने तर्क दिया कि यूजीसी के नियमों के तहत पदनाम और पदोन्नति को एक समान माना जाना चाहिए, इसलिए उनकी नियुक्ति सही है।
हाईकोर्ट ने खारिज किए पुराने तर्क
अदालत ने डॉ. सचदेवा और विभाग के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ‘कॅरियर एडवांसमेंट स्कीम’ के तहत मिलने वाला पदनाम, नियमित प्रमोशन से मिलने वाली वरिष्ठता की जगह नहीं ले सकता। जस्टिस पिल्लई ने स्पष्ट किया कि यूजीसी के नियम केवल वेतनमान और अकादमिक स्थिति तय करने के लिए प्रभावी होते हैं, लेकिन जब बात प्रशासनिक जिम्मेदारी और सीनियरिटी की आती है, तो वास्तविक पदोन्नति की तारीख ही मान्य होगी।
सरकार को आदेश: डॉ. मंजू शर्मा को सौंपें कार्यभार
हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी पुराने आदेशों को रद्द करते हुए राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक कॉलेज में किसी नियमित प्राचार्य की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक डॉ. मंजू शर्मा को ही प्रभारी प्राचार्य का कार्यभार सौंपा जाए। इस फैसले से प्रदेश के अन्य विभागों में भी वरिष्ठता को लेकर चल रहे विवादों पर लगाम लगने की उम्मीद है और योग्य अधिकारियों को उनका हक मिलने का रास्ता साफ हुआ है।
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