भीमा कोरेगांव केस में SC ने 2 आरोपियों को दी जमानत, मोबाइल फोन हमेशा ऑन रखने के निर्देश

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नई दिल्ली: भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पांच शर्तों के साथ शुक्रवार को दो आरोपियों वेरनन गोंजाल्‍वेस और अरुण फरेरा को जमानत दे दी है। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने जमानत देते हुए कहा कि हालांकि दोनों आरोपियों के खिलाफ आरोप गंभीर हैं, लेकिन सिर्फ यही जमानत से इनकार करने की वजह नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में ही इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जमानत नहीं दी जा सकती। जमानत देने के बारे में अपनी राय बनाते समय, हमने नोट किया कि उन्हें पहले 1967 अधिनियम के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। इसलिए, हम जमानत पर रहते हुए उचित शर्तें लगाने का प्रस्ताव करते हैं। हम विवादित आदेश को रद्द करते हैं और अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करते हैं। गोंजाल्वेस और फरेरा को 2018 में मुंबई की तलोजा जेल भेजा गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत नामंजूर होने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। दोनों ने कहा था कि हाईकोर्ट ने उनकी बेल एप्लीकेशन को खारिज कर दिया, जबकि सह-आरोपी सुधा भारद्वाज को जमानत दे दी।

वेरनन गोंजाल्‍वेस और अरुण फरेरा देते समय सुप्रीम कोर्ट ने जो पांच शर्तें लगाई हैं, उनमें दोनों आरोपियों को महाराष्‍ट्र छोड़ने पर रोक रहेगी, अर्थात दोनों आरोपी महाराष्ट्र नहीं छोड़ सकते हैं। दोनों आरोपियों के पास एक-एक मोबाइल रहेगा। और ये मोबाइल फोन कभी स्विच्ड ऑफ नहीं होगा। अपनी लोकेशन भी हमेशा ऑन रखेंगे। आरोपियों का फोन इस केस के इंचार्ज एनआईए अफसर से जुड़ा रहेगा। बता दें कि पुणे में एल्गर परिषद सभा 31 दिसंबर 2017 को हुई थी। पुलिस के मुताबिक, इसकी फंडिंग नक्सलियों ने की थी। पुलिस का आरोप था कि सभा में भड़काऊ भाषण के चलते पुणे के भीमा-कोरेगांव वॉर मेमोरियल पर अगले दिन यानी 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़क गई।

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