पुलिस को नख दंत विहीन शेर के रूप में देखना चाहता है विपक्ष

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मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में एक समस्या बड़ी जोरों से बढ़ रही है। वह यह है कि जब कभी सरकार किसी अपराधी का एनकाउंटर या शार्ट एनकाउंटर करती है, तब विपक्षी उसे या तो फर्जी साबित करने में जुट जाते हैं, या फिर यह आरोप लगने लगते हैं कि जिनका एनकाउंटर करके मारा गया अथवा घायल किया गया है, वह बेकसूर आम आदमी था। दूसरी ओर सरकार का दावा यही रहता है कि उसने जिस पर गोली चलाई वह इसी लायक था और जब सामने से प्राण घातक हमले किए गए तब पुलिस को अपनी सुरक्षा में एक्शन लेना पड़ा। फल स्वरुप आरोपी अथवा अपराधी की या तो मौत हो गई या फिर वह घायल हो गया। यदि गौर से देखा जाए तो दोनों ही पक्ष कहीं ना कहीं अर्ध सत्य बोलने प्रतीत होते हैं। जैसे विपक्ष की बात करें तो उसे सरकार द्वारा की गई प्रत्येक कार्रवाई में केवल और केवल दोष ही दिखाई देता है। बल्कि यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि विपक्ष समझता सब है लेकिन वह अपने राजनीतिक लाभ हानि के चलते कुछ भी समझना नहीं चाहता। उसका एक ही लक्ष्य होता है, वह यह कि किसी न किसी तरह सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। फिर भले ही इसके लिए सफेद झूठ ही क्यों ना बोलना पड़ जाए। उदाहरण के लिए उन मामलों पर गौर किया जा सकता है जिन में अपराधियों ने आम आदमी का जीना दुश्वार किया। उनके हौसले यहां तक बुलंद हुए की यदा कदा पुलिस पर भी अटैक किए जाने लगे। नतीजतन केवल पुलिस को ही नहीं बल्कि शासन और प्रशासन को भी एक्शन में आना पड़ा। फल स्वरुप अपराधी मारे गए तो समाज में एक सकारात्मक संदेश चला गया। वह यह कि अब आम आदमी को अपराधियों से बचाव और सुरक्षा के लिए अदालत की लंबी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ा। बल्कि पुलिस प्रशासन में बेहद कम समय में ही अपने स्तर पर न्याय करके अपराधियों को वहां पहुंचा दिया, वह जहां के लायक थे। इसका प्रभाव यह देखने में आया की काफी हद तक अपराधी किस्म के लोग या तो अपने क्षेत्र से पलायन कर गए अथवा उन्होंने अपने आप को अपराधिक दुनिया से अलग कर लिया। मध्य प्रदेश में भी ऐसे दृश्य कभी-कभी देखने को मिल जाते हैं। अभी ताजा-ताजा मामले की बात करें तो विधानसभा में विपक्ष ने इसलिए हंगामा खड़ा कर दिया, क्योंकि उसे लगता है मंडला जिले में पुलिस ने नक्सलियों का जो एनकाउंटर किया वह फर्जी था। उसके द्वारा सरकार पर यह आरोप भी लगाए गए तथा दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच बिठाए जाने की मांग कर डाली। हालांकि घटनाक्रम बताता है की यह मुठभेड़ फर्जी तो कतई नहीं थी। क्योंकि इसमें एक महिला ने आपबीती बताई है कि उसका पति 9 मार्च को घर से निकला और हॉक फोर्स बल तथा नक्सलियों के बीच चल रही मुठभेड़ में फंस गया। दोनों ओर से हो रही गोलीबारी में उसकी मौत हो गई। बता दें कि घटना मंडला बालाघाट की सीमा से लगे चिमटा कैंप क्षेत्र में घटित होना बताई जाती है। फिर भी विपक्षी नेताओं की कार्यप्रणाली यह है कि उन्होंने मंडला में नक्सली एनकाउंटर पर सवाल उठाते हुए विधानसभा में जमकर हंगामा किया। एनकाउंटर को फर्जी बताया। उच्च स्तरीय जांच की मांग की और दोषियों पर कार्रवाई करने को कहा। नेता प्रतिपक्ष की ओर से कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए गए। आरोप लगाए गए कि भाजपा शासन में आदिवासी सुरक्षित नहीं है। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष उन्हें शांत करने के लगातार प्रयास करते रहे। यहां तक कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने स्पष्ट कर दिया कि मामले में न्यायिक जांच के आदेश हो चुके हैं। बहुत जल्दी दूध का दूध और पानी का पानी होने वाला है। विपक्ष को धैर्य के साथ नतीजे का इंतजार करना चाहिए। इसके बावजूद अनेक विपक्षी नेता विधानसभा के गर्भ गृह में एकत्रित हो गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। विपक्ष की इस कार्य प्रणाली की जितनी निंदा की जाए कम है। कम से कम इसे विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की घोषणा पर गौर करना चाहिए। यहां तक कि जब न्यायिक जांच के आदेश हो गए हैं तब विधानसभा में हो हल्ला करने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। इसके बावजूद यदि तार्किक और तथ्यात्मक बहस को केंद्र में ना रखा गया तो फिर आम जनता में विपक्ष के प्रति जो विश्वास घट रहा है, उसमें निरंतर बनी रहने वाली है। यह परिदृश्य कम से कम लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए तो ठीक नहीं है। मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को इस बारे में गंभीरता से विचार करते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

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