एजेंसी, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य मजहब को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पिछले आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से जुड़ा व्यक्ति जैसे ही कोई दूसरा धर्म स्वीकार करता है, उसका एससी का दर्जा तत्काल और पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नियम के अनुसार ऐसे किसी भी व्यक्ति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उसे संविधान, संसद या राज्य विधानसभा के किसी भी कानून के तहत मिलने वाले वैधानिक लाभ, सुरक्षा या आरक्षण की सुविधा नहीं दी जा सकती। पीठ ने साफ किया कि यह पूरी तरह वर्जित है और इसमें किसी भी प्रकार की रियायत की गुंजाइश नहीं है। कोई भी व्यक्ति निर्धारित धर्मों के अलावा किसी अन्य मत का पालन करते हुए अनुसूचित जाति की सदस्यता का हकदार नहीं हो सकता।
The Supreme Court has ruled that a person who professes a religion other than Hinduism, Sikhism or Buddhism cannot be recognised as a member of a Scheduled Caste.
A bench of Justices P. K. Mishra and N. V. Anjaria ruled that conversion to any other religion results in the loss…
— ANI (@ANI) March 24, 2026
इससे पहले आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल 2025 को अपने निर्णय में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार कर लेता है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, तो वह अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं रह जाता। उच्च न्यायालय का तर्क था कि ईसाई धर्म में जाति प्रथा का कोई स्थान नहीं है, इसलिए वहां अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते। इस आधार पर अदालत ने ईसाई धर्म अपनाने वाले एक शिकायतकर्ता के उन आरोपों को रद्द कर दिया था जिसमें उसने एक आपराधिक मामले में इस कानून का सहारा लिया था। इस आदेश के विरुद्ध याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
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उच्चतम न्यायालय ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का हवाला देते हुए कहा कि इसके खंड 3 में स्पष्ट है कि निर्दिष्ट धर्मों को छोड़कर दूसरा रास्ता चुनने पर एससी का दर्जा खत्म हो जाता है। इस मामले में याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने ईसाई धर्म छोड़कर वापस अपने मूल धर्म में वापसी कर ली है, लेकिन सबूतों से यह सिद्ध हुआ कि वह एक दशक से अधिक समय से पादरी के रूप में कार्य कर रहा था और नियमित रूप से प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहा था।
मामले के अनुसार, पादरी सी. आनंद ने 2021 में ए आर रेड्डी नामक व्यक्ति के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था। आनंद का आरोप था कि प्रार्थना के दौरान उन पर हमला किया गया और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया गया। हालांकि, अदालत ने पाया कि धर्म परिवर्तन के कारण वह अब इस विशेष अधिनियम के तहत संरक्षण पाने के पात्र नहीं हैं।


