सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय का रजिस्ट्री कार्यालय पर तीखा प्रहार : न्यायालय की अवमानना और प्रशासनिक शिथिलता पर पीठ ने जताई गंभीर नाराजगी

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एजेंसी, नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही प्रशासनिक विंग अर्थात रजिस्ट्री कार्यालय के अड़ियल और स्वेच्छाचारी रवैये पर अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए उसे पूरी तरह से ”अनुचित” करार दिया है। न्यायालय ने अत्यंत तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि रजिस्ट्री के अधिकारी स्वयं को न्यायाधीशों से भी ऊपर यानी ”सुपर सीजेआई” (प्रधान न्यायाधीश) समझने की भूल कर रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की संयुक्त खंडपीठ ने यह तल्ख टिप्पणी लगभग 37,000 करोड़ रुपये से अधिक के बहु-चर्चित निवेश धोखाधड़ी मामले की मुख्य आरोपी आयुषी मित्तल उर्फ ​​आयुषी अग्रवाल द्वारा दायर की गई नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। प्रधान न्यायाधीश ने मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए 23 मार्च को पीठ द्वारा पारित किए गए एक पूर्व आदेश का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर गहरा आश्चर्य और रोष प्रकट किया कि रजिस्ट्री के अधिकारियों ने अपनी सीमित समझ के आधार पर यह कैसे मान लिया कि पीठ ने इस मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य संबंधित प्रतिवादियों को आधिकारिक नोटिस जारी करने का निर्देश नहीं दिया था। शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि रजिस्ट्री ने इस पूरे प्रकरण में पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना और अनुचित व्यवहार किया है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि वहां कार्यरत प्रत्येक प्रशासनिक कर्मचारी स्वयं को ‘सुपर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया’ मानकर न्यायिक आदेशों की मनमानी व्याख्या कर रहा है।

न्यायिक रजिस्ट्रार को तथ्यान्वेषण जांच के आदेश और प्रवर्तन निदेशालय को नोटिस

शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने रजिस्ट्री की इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को सुधारते हुए अपने नवीनतम आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक को पूर्व में कोई आधिकारिक नोटिस प्रेषित नहीं किया गया, जो कि न्यायालय के मूल मंतव्य के पूरी तरह विपरीत था। पीठ ने आदेश दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक रजिस्ट्रार स्वयं इस पूरे मामले की गहन तथ्यान्वेषण (फैक्ट फाइंडिंग) जांच करें कि आखिर किस आधार पर और किन परिस्थितियों में 23 मार्च के न्यायिक आदेश का यह त्रुटिपूर्ण अर्थ निकाला गया कि ईडी को नोटिस जारी नहीं किया जाना है। इसके साथ ही, अदालत ने अविलंब प्रवर्तन निदेशालय को इस मामले में पक्षकार बनाते हुए नया नोटिस तामील करने का निर्देश जारी किया। उल्लेखनीय है कि मुख्य याचिकाकर्ता आयुषी मित्तल, उनके पति और उनसे संबद्ध व्यावसायिक कंपनियों पर देश के हजारों निर्दोष निवेशकों के साथ व्यापक स्तर पर वित्तीय धोखाधड़ी और पोंजी स्कीम संचालित करने के अत्यंत संगीन आपराधिक आरोप हैं। हालांकि, बचाव पक्ष के कानूनी सलाहकारों का न्यायालय में यह दावा है कि उनके मुवक्किलों द्वारा निवेशकों की मूल धनराशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा पहले ही नियमानुसार लौटाया जा चुका है, परंतु वर्तमान समय में केंद्रीय एजेंसी ईडी द्वारा कुर्क (फ्रीज) किए गए विभिन्न बैंक खातों में कई सौ करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि फंसी होने के कारण शेष भुगतान में तकनीकी अड़चन आ रही है।

राजस्थान सरकार के मौखिक अनुरोध पर ईडी को पक्षकार बनाने का विधिक निर्णय

इस पूरे विधिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालें तो खंडपीठ ने 23 मार्च को हुई पिछली सुनवाई के दौरान इस मामले में मुख्य पक्षकार के रूप में उपस्थित राजस्थान राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा किए गए उस मौखिक अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया था, जिसमें जांच की निष्पक्षता के लिए प्रवर्तन निदेशालय को भी इस कानूनी कार्यवाही में अनिवार्य रूप से शामिल करने की मांग की गई थी। इस न्यायिक निर्णय का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि याचिकाकर्ता और उसके पूरे परिवार से संबंधित जितनी भी चल और अचल संपत्तियां देश के भीतर मौजूद हैं, क्या उन्हें कानूनन पूरी तरह से कुर्क कर लिया गया है अथवा नहीं। शीर्ष अदालत की पीठ ने एक बार फिर अपने पुराने रुख को पूरी तरह से दोहराते हुए स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी पक्ष की समस्त संपत्तियों का एक-एक ”विस्तृत और प्रमाणित विवरण” न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर दिया जाता, तब तक वह इस जमानत याचिका के गुण-दोष (मेरिट) पर आगे कोई विचार नहीं करेगी।

आरोपी के संपूर्ण परिवार और कंपनी के प्रमुख अधिकारियों की संपत्ति का मांगा ब्योरा

न्यायालय ने मामले की कड़ियों को आपस में जोड़ते हुए याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ विधिक प्रतिनिधियों को एक कड़ा निर्देश जारी किया है। इसके तहत याचिकाकर्ता को एक विस्तृत कानूनी हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल करना होगा, जिसमें स्वयं मुख्य आरोपी, उसके पति, उनके नाबालिग व बालिग बच्चों, माता-पिता, सगे भाई-बहनों तथा सास-ससुर के नाम पर दर्ज देश-विदेश की समस्त अचल संपत्तियों का पूरा लेखा-जोखा अनिवार्य रूप से देना होगा। इसके अतिरिक्त, अदालत ने आरोपी कंपनी के निदेशक मंडल में शामिल अन्य सदस्यों, महाप्रबंधकों और प्रमुख प्रशासनिक कर्मचारियों की निजी संपत्तियों का विवरण भी तलब किया है। पीठ ने बेहद कड़े लहजे में कहा कि जब तक यह संपूर्ण वित्तीय और भौतिक विवरण अदालत के रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक आरोपी की रिहाई अथवा जमानत याचिका पर विचार करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। फिलहाल, न्यायिक रजिस्ट्रार को रजिस्ट्री के भीतर हुई इस बड़ी प्रशासनिक और लिपिकीय चूक की आंतरिक जांच करने का वैधानिक दायित्व सौंपा गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अदालत के पिछले स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी किस स्तर पर और क्यों की गई। पीठ ने अंत में सूचित किया कि इस मामले की अगली सुनवाई मई मास के किसी निर्धारित कार्यदिवस पर सूचीबद्ध की जाएगी।

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