शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन होती है माता महागौरी की विशेष आराधना
एजेंसी, नई दिल्ली। आमतौर पर आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार सनातन धर्म में शारदीय नवरात्रि का पर्व बेहद धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पवित्र नौ दिवसीय उत्सव के दौरान मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। पंचांग के अनुसार नवरात्रि की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व माना गया है क्योंकि इस पावन दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप माता महागौरी की उपासना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों और शास्त्रों के अनुसार माता महागौरी की पूजा करने से न केवल भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं बल्कि जीवन के तमाम कष्टों और विकारों से भी मुक्ति मिलती है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी इस स्वरूप की आराधना को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है क्योंकि माता महागौरी का संबंध राहु ग्रह के नियंत्रण से भी जुड़ा हुआ है।
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श्वेत वर्ण और असीम शांति की प्रतीक हैं माता महागौरी
पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार मां महागौरी का यह नाम उनके अत्यंत गौर और उज्ज्वल वर्ण के कारण पड़ा है। उनका यह स्वरूप पूरी तरह से श्वेत वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित रहता है जो शांति, पवित्रता और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। सनातन धर्म के जानकारों का ऐसा मानना है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से नवरात्रि के आठवें दिन माता के इस स्वरूप का ध्यान और पूजन करता है उसके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। इसके अलावा जिन जातकों की कुंडली में राहु ग्रह से संबंधित कोई भी दोष या अशुभ प्रभाव चल रहा हो उनके लिए माता महागौरी की शरण में जाना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। इस दिन माता की आराधना के साथ उनकी पौराणिक कथा का पाठ करना अनिवार्य माना गया है जिससे साधक को पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
शिव पुराण में वर्णित माता पार्वती की कठिन तपस्या की कथा
शिव पुराण में विस्तार से उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती ने अत्यंत कठिन और घोर तपस्या का मार्ग चुना था। प्राचीन काल में उन्होंने कई वर्षों तक जंगलों में रहकर कठोर साधना की थी ताकि महादेव उन्हें स्वीकार कर लें। माता की इस साधना की कठोरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय के बाद उन्होंने अन्न और जल का भी पूर्ण त्याग कर दिया था। लंबे समय तक बिना कुछ खाए-पिए लगातार तपस्या करने के कारण उनका कोमल शरीर कमजोर होकर मुरझाने लगा और तेज धूप तथा साधना की अग्नि से उनका स्वाभाविक गौर वर्ण भी सांवला पड़ने लगा था।
गंगा स्नान के बाद प्रकट हुआ माता का दिव्य और कांतिमय स्वरूप
हजारों वर्षों की इस कठिन तपस्या के बाद अंततः भगवान शिव माता पार्वती की साधना से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने देवी को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। वरदान देने के पश्चात भगवान शिव ने अपनी जटाओं में विराजमान मां गंगा के पवित्र जल से माता पार्वती को स्नान करवाया। पौराणिक कथा के अनुसार गंगा के उस पावन और अमृततुल्य जल से स्नान करते ही माता का शरीर फिर से पूरी तरह कांतिमय, कोमल और श्वेत वर्ण में परिवर्तित हो गया। ऐसा विश्वास किया जाता है कि गंगा स्नान के बाद माता के इस रूप से निकलने वाला प्रकाश दसों दिशाओं में फैल गया था जिसके बाद से उनका यह स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस रूप की कृपा से भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित शुंभ-निशुंभ वध की कथा
मार्कण्डेय पुराण के पांचवें अध्याय में माता महागौरी से जुड़ी एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण कथा का भी वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षसों ने तीनों लोकों में भयंकर आतंक मचा रखा था और उनके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता अत्यधिक भयभीत हो गए थे। अपनी इस समस्या का समाधान पाने के लिए सभी देवता हिमालय पर्वत पर पहुंचे और उन्होंने माता पार्वती की स्तुति करना शुरू कर दिया। जिस समय देवता माता की स्तुति कर रहे थे, ठीक उसी समय माता पार्वती पवित्र गंगा नदी में स्नान कर रही थीं। देवताओं की पुकार और उनकी पीड़ा को सुनकर माता के शरीर से एक अत्यंत दिव्य और तेजवान देवी का प्राकट्य हुआ।
कौशिकी और महागौरी के रूप में राक्षसों का किया संहार
माता पार्वती के शरीर से प्रकट होने वाली इन अलौकिक देवी को ही महागौरी और कौशिकी दोनों नामों से पुकारा गया। अपने इस तेजस्वी रूप में उन्होंने शुंभ और निशुंभ जैसे महाबली असुरों के चंगुल से देवताओं को मुक्त कराया और उनके प्रकोप का अंत किया। नवरात्रि के इन विशेष दिनों में अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष स्थान है क्योंकि इस दौरान कन्या पूजन का विधान भी निभाया जाता है। विद्वानों के अनुसार इन दिनों में माता की कथा सुनने और विधि-विधान से हवन व पूजन करने से मनुष्य का जीवन धन-धान्य और सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हो जाता है।
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