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भवानीपुर में बदला सियासी समीकरण, ममता बनर्जी को करारी शिकस्त देकर शुभेंदु अधिकारी ने रचा नया इतिहास

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एजेंसी, कोलकाता। भवानीपुर में बदला सियासी समीकरण : पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर विधानसभा सीट से ऐसा परिणाम सामने आया है जिसने पूरे राज्य के राजनीतिक माहौल को झकझोर कर रख दिया है। लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी को इस प्रतिष्ठित सीट पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने बड़े अंतर से पराजित कर दिया। इस जीत को केवल एक चुनावी सफलता नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति में सत्ता संतुलन बदलने वाले घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

भवानीपुर सीट पर मतगणना के दौरान लगातार रोमांच बना रहा। शुरुआती दौर में शुभेंदु अधिकारी ने बढ़त हासिल कर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। हालांकि कुछ ही समय बाद ममता बनर्जी ने जबरदस्त वापसी करते हुए लगभग सोलह हजार मतों की मजबूत बढ़त बना ली। उस समय ऐसा माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री आसानी से यह चुनाव जीत जाएंगी, लेकिन मतगणना आगे बढ़ने के साथ पूरा समीकरण बदलता चला गया।

मतगणना के अंतिम चरणों में पलटा पूरा खेल

जैसे-जैसे मतगणना के चरण आगे बढ़ते गए, ममता बनर्जी की बढ़त लगातार घटती चली गई। सत्रहवें चरण तक पहुंचते-पहुंचते स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। शुभेंदु अधिकारी ने अचानक बढ़त हासिल कर ली और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। अंतिम तीन चरणों में उन्होंने अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत किया तथा अंततः भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कर ली।

चुनाव परिणामों के अनुसार भवानीपुर विधानसभा सीट पर कुल बीस चरणों में मतगणना हुई। शुभेंदु अधिकारी को कुल 73 हजार 463 मत प्राप्त हुए जबकि ममता बनर्जी के पक्ष में 58 हजार 349 मत पड़े। इस प्रकार मुख्यमंत्री को 15 हजार 114 मतों के बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम पश्चिम बंगाल की राजनीति में दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है।

बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक मानी जा रही है यह जीत

भवानीपुर सीट लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री का यहां से हार जाना राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शुभेंदु अधिकारी की यह जीत इसलिए भी विशेष बन गई है क्योंकि इससे पहले भी उन्होंने नंदीग्राम विधानसभा सीट पर ममता बनर्जी को पराजित किया था। उस चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने भवानीपुर सीट से उपचुनाव लड़कर विधानसभा में वापसी की थी, लेकिन इस बार उन्हें यहां भी हार का सामना करना पड़ा।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शुभेंदु अधिकारी ने अपनी रणनीति, संगठन क्षमता और जनसंपर्क के बल पर यह बड़ी सफलता हासिल की है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने लगातार राज्य सरकार पर कई मुद्दों को लेकर हमला बोला था और जनता के बीच खुद को मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। इसका असर मतदान परिणामों में साफ दिखाई दिया।

भारतीय जनता पार्टी को मिली बड़ी बढ़त

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पहली बार इतनी बड़ी सफलता हासिल करती दिखाई दे रही है। निर्वाचन आयोग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार पार्टी ने 294 विधानसभा सीटों में से 208 सीटों पर बढ़त बनाई या जीत दर्ज की है। यह आंकड़ा सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत से काफी अधिक माना जा रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस लगभग 79 सीटों तक सीमित होती दिखाई दे रही है।

इन परिणामों ने बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव संकेतित कर दिया है। लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर प्रभाव रखने वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम बड़ा झटका माना जा रहा है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भारी उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।

समर्थकों में जश्न, राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज

भवानीपुर से परिणाम सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने कई स्थानों पर जश्न मनाना शुरू कर दिया। ढोल-नगाड़ों और मिठाइयों के साथ कार्यकर्ताओं ने इस जीत को ऐतिहासिक बताया। वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के खेमे में मायूसी का माहौल देखने को मिला।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनाव परिणाम के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई रणनीतियां और नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं। शुभेंदु अधिकारी की लगातार दूसरी बड़ी जीत ने उन्हें राज्य की राजनीति में बेहद प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। वहीं ममता बनर्जी के लिए यह हार भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों का संकेत मानी जा रही है।

जनता के फैसले ने बदल दी राजनीतिक तस्वीर

भवानीपुर सीट का यह चुनाव केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे पूरे पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाले मुकाबले के रूप में देखा गया। जनता ने जिस प्रकार अपना फैसला सुनाया है, उसने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह परिणाम बंगाल की सत्ता और विपक्ष दोनों की रणनीति पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

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