प्रधानमंत्री मोदी

पश्चिम एशिया में युद्ध के बीच प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी कूटनीतिक पहल : 24 घंटे में पांच देशों के प्रमुखों से की बात, शांति और सुरक्षित समुद्री मार्ग पर दिया जोर

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एजेंसी, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के संकट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल-गैस की आपूर्ति में आ रही बाधाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने एक बड़ी कूटनीतिक सक्रियता दिखाई है। पिछले 24 घंटों के भीतर प्रधानमंत्री ने दुनिया के पांच प्रभावशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों से फोन पर विस्तृत चर्चा की। मोदी ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए केवल संवाद और कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है।

प्रधानमंत्री ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बातचीत के दौरान मौजूदा हालात पर गहरी चिंता जताई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि शांति बहाली के लिए मिल-जुलकर काम करना अनिवार्य है। इसके साथ ही मोदी ने ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक और कुवैत के क्राउन प्रिंस शेख सबाह से भी चर्चा की। प्रधानमंत्री ने कुवैत और ओमान पर हुए हालिया हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की और वहां रह रहे भारतीय समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आभार व्यक्त किया।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय होर्मुज जलडमरूमध्य (होर्मुज स्ट्रेट) से जहाजों की आवाजाही है। प्रधानमंत्री ने ओमान के सुल्तान और कुवैत के नेतृत्व से बातचीत में इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस समुद्री मार्ग से मालवाहक जहाजों का बिना किसी रुकावट के निकलना वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। गौरतलब है कि ईरान द्वारा इस मार्ग को बाधित किए जाने से पूरी दुनिया में तेल और गैस का संकट गहरा गया है।

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इस भीषण युद्ध और समुद्री तनाव के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर भी सामने आई है। दो भारतीय गैस टैंकर, ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’, सफलतापूर्वक होर्मुज के खतरनाक रास्ते को पार कर गुजरात के मुंद्रा और कांडला बंदरगाह पहुंच गए हैं। इन जहाजों के जरिए लगभग 93 हजार मीट्रिक टन रसोई गैस भारत आई है। यह आपूर्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष के कारण इस मार्ग पर दर्जनों जहाज फंसे हुए हैं और भारत की कूटनीतिक कोशिशों के चलते इन टैंकरों को सुरक्षित रास्ता मिल सका।

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच 28 फरवरी से जारी इस युद्ध ने अब एक विनाशकारी रूप ले लिया है। ईरान के शीर्ष नेतृत्व के सफाए के बाद तेहरान ने खाड़ी के अन्य देशों पर भी हमले तेज कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो देशों से मदद की अपील के बावजूद कई देशों ने इस युद्ध क्षेत्र में अपने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया है। ऐसे में भारत की यह सक्रियता न केवल अपने नागरिकों और हितों की रक्षा के लिए है, बल्कि वैश्विक शांति की दिशा में भी एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

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