जहरीले सिरप से बच्चों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव का रुख बेहद कड़ा नजर आ रहा है। यही कारण है कि इस मामले में जितने भी लोग प्रथम दृष्टया दोषी दिखाई दे रहे हैं, उन्हें या तो पदों से हटाया जा चुका है या फिर उनके सस्पेंशन की कार्रवाई चल रही है। यह तो सभी जानते हैं कि मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक जहरीले कफ सिरप के सेवन से लगभग 15 बच्चों की जान जा चुकी है। इसके चलते विपक्षी नेताओं को सरकार पर हमला करने का अवसर मिला हुआ है। वहीं मध्य प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार बच्चों को और उनके परिजनों को न्याय मिले, इस दृष्टि से इस मामले में पूरी ताकत लगा रही है। अपनी इसी कार्रवाई को अंजाम देते हुए सरकार ने दवाओं की टेस्ट रिपोर्ट आने के तत्काल बाद कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। इसी का परिणाम है कि मध्य प्रदेश के ड्रग कंट्रोलर दिनेश कुमार मौर्य को उनके पद से हटाया जा चुका है। उनके सहयोगी डिप्टी ड्रग कंट्रोलर शोभित कोष्टा को भी पद से हटाया गया है। इन दोनों के बारे में गौर करें तो यही वह दो अधिकारी हैं जिनकी जिम्मेदारी बनती थी कि कोई दवाई यदि मध्य प्रदेश में आ रही है, तो उसका लेबोरेटरी में टेस्ट करने और सही रिपोर्ट आने के बाद ही उसे मध्य प्रदेश में भंडारण परिवहन एवं बिक्री की अनुमति मिलने देते। लेकिन इस पूरे मामले को देखकर लगता है कि उन्होंने अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन नहीं किया। यही कारण है कि जहरीला सिरप मध्य प्रदेश में आता रहा और सरेआम बिकता रहा। इसी की वजह से सिरप बच्चों के किडनी लीवर जैसे नाजुक अंगों को खत्म करता रहा और बच्चे मौत के शिकार बनते चले गए। प्रदेश की मोहन सरकार ने उस डॉक्टर को भी गिरफ्तार करने में देर नहीं लगाई, जिसने विवादित कफ सिरप बच्चों को प्रिस्क्राइब किया और अपनी पत्नी के नाम रजिस्टर्ड मेडिकल स्टोर से उस कफ सिरप की बिक्री करता रहा। यह बात और है कि डॉक्टर की गिरफ्तारी से अन्य चिकित्सक संगठनों में रोष है। वह डॉक्टर की रिहाई चाहते हैं। लेकिन इसमें राजनीतिक स्टंट दिखाई देता है। यही कारण है कि डॉक्टर मोहन यादव ने डॉक्टरों के आंदोलन को ज्यादा तवज्जो ना देते हुए अपना फोकस केवल इस बात पर बनाए रखा है कि दोषियों को छोड़ना नहीं है और जो बच्चे बच्चे हैं उनकू इलाज पर सब कुछ न्योछावर कर देना है। जबकि डॉक्टर मोहन यादव की सरकार निर्णय ले चुकी है मृत बच्चों को और उनके परिजनों को हर हाल में न्याय मिलना चाहिए जबकि गंभीर रूप से बीमार हुए बच्चों के इलाज में किसी भी प्रकार की कमी ना रह जाए। इस बाबत स्वास्थ्य विभाग को सख्त निर्देश दिए जा चुके हैं। जैसा कि सभी जानते हैं इस बारे में एक जांच समिति भी गठित की जा चुकी है। मध्य प्रदेश शासन की ओर से सभी नागरिकों को संतुष्ट होना चाहिए कि जो भी अधिकारी कर्मचारी जांच में दोषी पाए जाएंगे उन्हें किसी भी हालत में छोड़ा नहीं जाएगा। फिर भले ही बो लोग कितनी ऊंची पहुंच रखते हों या फिर कितने भी ताकतवर क्यों ना हो। मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लिया है, यह इस बात से भी पता चलता है कि उन्होंने पहली फुर्सत में ही परासिया का दौरा किया और उन परिवारों से मिले जिनके बच्चे इस हादसे में मौत का शिकार बने। जबकि उन परिवारों से भी मुलाकात की, जिनके बच्चे बीमारी से जूझ रहे हैं। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि सरकार बच्चों के इलाज में खर्च की परवाह नहीं करेगी। हमारा टारगेट यह है कि हर हाल में बच्चों को स्वस्थ होना चाहिए। कुल मिलाकर अब इस पूरे मामले में लापरवाही करने वाले अधिकारियों के हाथ पैर फुले हुए हैं। क्योंकि अब इंसाफ का हंटर चल रहा है। अच्छी बात यह है कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की गंभीरता को देते हुए मृत बच्चों के माता-पिता भी स्वयं को संतुष्ट महसूस कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि मुख्यमंत्री उनके बच्चों को न्याय दिला कर ही चैन की सांस लेंगे।


