निर्जला एकादशी को क्यों कहते हैं भीमसेनी एकादशी? जानें इस पावन व्रत की पौराणिक कथा
एजेंसी, भोपाल। सनातन धर्म में एकादशी तिथि को बेहद पवित्र और उत्तम माना गया है। यह पावन दिन सृष्टि के रचयिता और पालनकर्ता भगवान विष्णु की आराधना के लिए पूरी तरह समर्पित होता है। ऐसी मान्यता है कि इस विशेष दिन पर जो भी भक्त पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ श्री हरि की पूजा-अर्चना करते हैं, उनके जीवन से सभी दुख-दरिद्र दूर हो जाते हैं और घर में सुख, शांति तथा अटूट समृद्धि का वास होता है। लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महीने में दो एकादशियां आती हैं—एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल चौबीस एकादशियां होती हैं और इन सभी का अपना अलग और विशेष महत्व है। परंतु इन सब में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सबसे श्रेष्ठ, सर्वोच्च और अत्यंत कठिन माना गया है, जिसे संसार निर्जला एकादशी के नाम से जानता है। इस व्रत की कठिनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें भोजन तो दूर, पानी की एक बूंद भी ग्रहण करने की मनाही होती है।
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पूरे वर्ष की एकादशियों के बराबर है इसका पुण्य फल
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ महीने की तपती गर्मी में रखे जाने वाले इस निर्जला एकादशी व्रत का पुण्य फल साल भर की सभी चौबीस एकादशियों के बराबर माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई श्रद्धालु किन्हीं कारणों से पूरे वर्ष की अन्य सभी एकादशियों का उपवास रखने में असमर्थ रहता है, तो वह केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा से रखकर उन सभी व्रतों के समान ही शुभ फल और पुण्य की प्राप्ति कर सकता है। इसी वजह से हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों के बीच इस तिथि का एक विशिष्ट स्थान है। इस पावन व्रत को समाज में ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी पुकारा जाता है। इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और शिक्षाप्रद प्राचीन कथा छिपी हुई है, जो हमें अपनी शारीरिक सीमाओं के बावजूद ईश्वर के प्रति समर्पण की सीख देती है।
भीमसेन की लाचारी और महर्षि व्यास का दिव्य सुझाव
पौराणिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि कुंती के पुत्र भीमसेन शारीरिक रूप से अत्यंत बलवान थे, परंतु इसके साथ ही वे भोजन के भी बहुत शौकीन थे। उनके भीतर की जठराग्नि इतनी तीव्र थी कि वे अपनी भूख पर तनिक भी नियंत्रण नहीं रख पाते थे। इसी शारीरिक विवशता के कारण उनके लिए महीने में दो बार आने वाला एकादशी का उपवास रखना पूरी तरह असंभव हो जाता था। दूसरी ओर, उनके बाकी चारों भाई—युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनकी पत्नी द्रौपदी—पूरे नियम-धर्म के साथ साल की प्रत्येक एकादशी का व्रत किया करते थे। भीमसेन अपनी इस कमजोरी के कारण मन ही मन बेहद ग्लानि महसूस करते थे और उन्हें लगता था कि वे व्रत न रखकर भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं। अपनी इसी दुविधा और मानसिक परेशानी का हल खोजने के लिए भीमसेन परम ज्ञानी महर्षि वेदव्यास जी की शरण में पहुंचे।
महर्षि व्यास ने भीमसेन की इस व्याकुलता और लाचारी को बेहद ध्यानपूर्वक सुना। उन्होंने भीमसेन के कष्ट को समझते हुए उन्हें एक अत्यंत सुलभ परंतु कड़ा मार्ग सुझाया। महर्षि ने कहा कि यदि वे पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का उपवास नहीं कर सकते, तो उन्हें केवल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन बिना जल ग्रहण किए पूर्ण संयम के साथ व्रत रखना चाहिए। महर्षि व्यास ने उन्हें आश्वस्त किया कि इस एकमात्र कठिन व्रत को करने से उन्हें वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों के बराबर पुण्यफल प्राप्त हो जाएगा और वे पापों से मुक्त हो जाएंगे। महर्षि की आज्ञा पाकर भीमसेन ने पूरी निष्ठा के साथ इस कठिन व्रत को पूरा किया। इसी ऐतिहासिक और पौराणिक घटना के कारण इस पावन तिथि को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से पुकारा जाने लगा।
वर्ष 2026 में शुभ मुहूर्त और पारण का सटीक समय
वर्ष 2026 में इस पवित्र व्रत को लेकर तिथियों का विवरण बेहद महत्वपूर्ण है। पंचांग की गणना के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून 2026 को शाम को 6 बजकर 12 मिनट पर होने जा रही है। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 25 जून 2026 को रात को 8 बजकर 9 मिनट पर होगा। उदयातिथि के नियमों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धालु 25 जून को मुख्य रूप से निर्जला एकादशी का कठिन उपवास रखेंगे। इसके बाद व्रत का पारण, यानी उपवास तोड़ने का शुभ समय अगले दिन 26 जून 2026 को सुबह 6 बजकर 3 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 42 मिनट के बीच रहेगा। इसी दिन द्वादशी तिथि का समापन रात को 10 बजकर 22 मिनट पर होगा। व्रत रखने वाले सभी श्रद्धालुओं को पारण के तय समय के भीतर ही अपना व्रत खोलना चाहिए ताकि उन्हें इस तपस्या का पूरा लाभ मिल सके।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। stpv.live एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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