एजेंसी, मंडला। Kanha Tiger Reserve : कान्हा नेशनल पार्क के भीतर रहस्यमयी परिस्थितियों में बाघों की लगातार हो रही मौतों के बाद आखिरकार वन्यजीव अधिकारियों और वैज्ञानिकों को इसकी मुख्य वजह का पता चल गया है। जबलपुर में स्थित ‘स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ’ की प्रयोगशाला में जब मृत बाघों के अंगों की गहन वैज्ञानिक जांच की गई, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। आरटी-पीसीआर नामक विशेष प्रयोगशाला विश्लेषण के जरिए इन सभी मृत बाघों के शरीर में ‘कैनाइन डिस्टेंपर वायरस’ यानी सीमीडी नामक बेहद ही घातक और जानलेवा विषाणु की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। इस वैज्ञानिक रिपोर्ट के सामने आने के बाद पार्क प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सभी छह बाघों की असमय मौत इसी खतरनाक संक्रामक बीमारी के कारण हुई थी। इस आकस्मिक हिंसक बीमारी ने देश के वन्यजीव संरक्षण दावों की कलई खोलकर रख दी है और पूरे क्षेत्र में चिकित्सकों तथा विशेष दस्तों को तैनात कर दिया गया है। बदलते हालातों के बीच इस घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
कान्हा टाइगर रिज़र्व में CDV रोकथाम हेतु खटिया इको सेंटर में समीक्षा बैठक आयोजित हुई। वन्यजीव निगरानी, कुत्तों के टीकाकरण और सामुदायिक सहभागिता पर चर्चा हुई। ग्राम छपरी व सरेखा के ग्रामीणों ने संरक्षण में सहयोग का आश्वासन दिया।#kanhatigerreserve pic.twitter.com/AscE5Bs39p
— Kanha Tiger Reserve (@TrKanha) May 22, 2026
सौ से अधिक बाघों पर चौबीस घंटे रखी जा रही है विशेष खोजी दस्ते की पैनी नजर
इस जानलेवा विषाणु की पुष्टि होने के बाद राष्ट्रीय उद्यान में हड़कंप मच गया है, क्योंकि कान्हा को बाघों की घनी आबादी के लिए जाना जाता है। संक्रमण के खतरे को देखते हुए वन्यजीव मुख्यालय के निर्देश पर पार्क में मौजूद सौ से अधिक बाघों को कड़ी और विशेष निगरानी में रख दिया गया है। मुख्य वन्यजीव संरक्षक समिता राजोरा ने इस आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष निगरानी टीम का गठन किया है। इस खोजी दस्ते को जंगलों के भीतर जाकर बाघों के पल-पल बदलते व्यवहार और उनकी गतिविधियों पर अत्यधिक सावधानी से नजर रखने के सख्त निर्देश दिए गए हैं ताकि संक्रमण के किसी भी शुरुआती लक्षण को समय रहते पकड़ा जा सके।
जंगलों में गश्त कर रहे मैदानी कर्मचारियों को दिए गए विशेष सुरक्षा निर्देश
राष्ट्रीय उद्यान की सुरक्षा में तैनात सभी मैदानी कर्मचारियों और वन रक्षकों को फील्ड में बेहद सतर्क रहने के लिए कहा गया है। पार्क प्रबंधन की ओर से जारी आधिकारिक गाइडलाइन के मुताबिक, यदि गश्त के दौरान किसी भी बाघ में बीमारी या कमजोरी के मामूली से मामूली चेतावनी संकेत दिखाई देते हैं, तो उसकी सूचना तुरंत वायरलेस के जरिए मुख्यालय को देने को कहा गया है। अधिकारियों ने कर्मचारियों को समझाया है कि यदि कोई बाघ अचानक लंगड़ाकर चलने लें, उसके शरीर में अत्यधिक कमजोरी दिखाई दे या वह किसी भी प्रकार की असामान्य हरकतें करता हुआ पाया जाए, तो उसे तुरंत चिन्हित कर वन्यजीव चिकित्सकों की टीम को सूचित किया जाए ताकि उसका समय पर इलाज शुरू हो सके।
संक्रमण प्रभावित नियंत्रण क्षेत्र के दस प्रतिशत बाघों को बेहोश कर लिए जाएंगे नमूने
इस जानलेवा महामारी को कान्हा के घने जंगलों में फैलने से रोकने की एक बहुत बड़ी और व्यापक रणनीति के तहत वन्यजीव विभाग के आला अधिकारियों ने एक बड़ा फैसला लिया है। इस योजना के अनुसार, जो इलाके पूरी तरह से संक्रमित पाए गए हैं और जिन्हें विशेष नियंत्रण क्षेत्र घोषित किया गया है, वहां रहने वाले लगभग दस प्रतिशत बाघों को विशेषज्ञों की देखरेख में सुरक्षित रूप से बेहोश किया जाएगा। बेहोश करने के बाद इन बाघों के शरीर से वैज्ञानिक और जैविक नमूने लिए जाएंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह जानलेवा विषाणु जंगल के भीतर अन्य स्वस्थ बाघों में किस हद तक फैल चुका है और इसका सही समय पर इलाज क्या हो सकता है।
आवारा कुत्तों और बिल्लियों से बाघों के इलाके में विषाणु फैलने की बड़ी आशंका
बेंगलुरु में स्थित नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी यानी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ टीम ने भी इस संकट की घड़ी में कान्हा का रुख किया है। इस केंद्रीय टीम को इस बात की सबसे ज्यादा चिंता सता रही है कि राष्ट्रीय उद्यान की सीमाओं से सटे हुए रिहायशी गांवों में घूमने वाले संक्रमित आवारा कुत्ते और बिल्लियां ही इस जानलेवा विषाणु के कान्हा के मुख्य बाघ-क्षेत्र में प्रवेश करने का सबसे बड़ा जरिया हो सकते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि अक्सर आवारा जानवर जंगल की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं और वन्यजीवों के संपर्क में आने से यह बीमारी महामारी का रूप ले लेती है।
राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास के ग्रामीण इलाकों में युद्धस्तर पर चलेगा टीकाकरण अभियान
इस गंभीर खतरे से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए केंद्रीय प्राधिकरण की टीम ने मध्य प्रदेश सरकार को कुछ बेहद महत्वपूर्ण और कड़े सुझाव दिए हैं। टीम ने पार्क के आस-पास की सभी ग्राम पंचायतों और बस्तियों में रहने वाले पालतू तथा आवारा कुत्तों और बिल्लियों का सीरो-प्रीवैलेंस अध्ययन यानी उनके रक्त में मौजूद प्रतिरक्षी तत्वों की जांच कराने की सिफारिश की है। इसके साथ ही, वन्यजीव मुख्यालय ने स्थानीय पशुपालन विभाग के सहयोग से सीमावर्ती गांवों में युद्धस्तर पर पशुओं के टीकाकरण का महा-अभियान शुरू करने की बात कही है ताकि भविष्य में कोई भी बाहरी जानवर इस जानलेवा विषाणु को लेकर बाघों के संरक्षित क्षेत्र के करीब न आ सके।
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