यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई एक और याचिका, जानें क्या है पूरा मामला

यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई एक और याचिका, जानें क्या है पूरा मामला

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एजेंसी, नई दिल्ली। उच्च शिक्षा संस्थानों को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों का लगातार विरोध हो रहा है। इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। इसी क्रम में मंगलवार को एक और याचिका दाखिल की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण हैं। वकील विनीत जिंदल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है।

उन्होंने कहा कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण हैं और उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि यूजीसी रेगुलेशंस-2026 के प्रावधान 3(सी) को लागू करने पर रोक लगाई जाए। इसके अलावा, 2026 के नियमों के अंतर्गत बनाई गई व्यवस्था सभी जाति के व्यक्तियों के लिए लागू हो। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए नियम 3(सी) को चुनौती दी गई। एक जनहित याचिका (पीआईएल) में यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है। याचिका में कहा गया कि नियम 3(सी) संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। साथ ही, यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है। बता दें कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू किया।

इसके तहत कई संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनाने और भेदभाव विरोधी नीति लागू करने के निर्देश दिए गए। यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है, जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (जैसे डिग्री रोकना, संस्थान की मान्यता रद्द करना आदि) कर सकेगी। यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच साल में विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118 प्रतिशत बढ़ी हैं। ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार किए गए थे, जहां एक पुरानी याचिका में कैंपस पर भेदभाव रोकने के लिए मजबूत तंत्र की मांग की गई थी।

यूजीसी के नए नियम पर मचा बवाल : शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान, कहा- नहीं होने देंगे किसी के साथ अन्याय
यूजीसी के नए नियमों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं होगा। किसी के साथ भेदभाव या अत्याचार के लिए इन प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाएगा। इसके साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने यूजीसी, केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के तय दायित्व की भी बात कही। केंद्रीय शिक्षा मंत्री का कहना है कि वह सभी को आश्वस्त करते हैं कि किसी से भी भेदभाव नहीं होगा और कोई भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में आई है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर कई नेताओं व संगठनों ने संशय व्यक्त किया है। इस संशय पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि वह सभी को आश्वस्त करते हैं कि किसी से भी भेदभाव नहीं होगा और कोई भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा।

उन्होंने दोहराया कि सरकार का उद्देश्य उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और जवाबदेह बनाना है। वहीं यूजीसी का मानना है कि नए नियमों का मकसद शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता बढ़ाना और सभी हितधारकों के अधिकारों की रक्षा करना है। धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि किसी वर्ग, समुदाय या व्यक्ति के साथ अन्याय न हो। यूजीसी के अधिकारियों का कहना है कि नियमों के लागू होने से किसी का उत्पीड़न नहीं होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि छात्रों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों के हित सर्वोपरि रहेंगे और सभी आशंकाओं को दूर करने के लिए संवाद का रास्ता खुला रहेगा। वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से यूजीसी के इन नियमों को लेकर प्रश्न पूछे गए। मंगलवार को उनसे पूछा गया कि यह पूरा मामला क्या है। क्या लोग इस मामले को समझ ही नहीं पा रहे हैं या फिर जानबूझकर विवाद बनाया जा रहा है।

इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि वह पूरी विनम्रता के साथ सभी को आश्वस्त करना चाहते हैं कि किसी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा।  शिक्षा मंत्री ने कहा कि भेदभाव के नाम पर किसी को भी इसका अनुचित इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं रहेगा। इसमें यूजीसी हो, भारत सरकार हो या राज्य सरकार हो, इसमें उनका दायित्व रहेगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि वह आश्वस्त करते हैं कि जो व्यवस्था हुई है, भारत की जो भी व्यवस्था हो, वह संविधान की परिधि के अंदर होगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह जो विषय आया है, यह तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में व्यवस्था है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने यह भी दोहराया कि किसी पर भी अत्याचार नहीं होगा। दरअसल यूजीसी के नए नियमों का लगातार विरोध हो रहा है। इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण हैं। याचिकाकर्ता ने कहा है कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

इसका विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इन नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों के उत्पीड़न या शिकायत को शामिल नहीं किया गया है। यानी केवल पिछड़े वर्गों के छात्रों की शिकायत पर ही कार्रवाई होगी। शिकायत गलत पाए जाने की स्थिति में शिकायतकर्ता के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी यह भी स्पष्ट नहीं है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू किया। इसके तहत कई संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनाने और भेदभाव विरोधी नीति लागू करने के निर्देश दिए गए। यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है।

यूजीसी कार्यालय के बाहर छात्रों का प्रदर्शन, नए नियमों के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर उतरे छात्र समुदाय
सामान्य वर्ग के छात्रों ने दिल्ली में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) मुख्यालय के बाहर मंगलवार को प्रदर्शन का आह्वान करते हुए कहा कि आयोग द्वारा जारी नए विनियम परिसरों में अराजकता पैदा कर सकते हैं। प्रदर्शन का आह्वान करने वालों ने छात्र समुदाय से एकजुटता की अपील की, उनसे ”यूजीसी के भेदभाव को ना” कहने का आग्रह किया और बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर अपना विरोध दर्ज कराने का अनुरोध किया। यूजीसी द्वारा 13 जनवरी को अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ की सामान्य श्रेणी के छात्रों ने व्यापक पैमाने पर आलोचना की है और उनका तर्क है कि यह ढांचा उनके खिलाफ भेदभाव का कारण बन सकता है।

महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए लाए गए नए विनियमों के तहत यूजीसी ने संस्थानों से शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और निगरानी दल गठित करने को कहा है ताकि खासकर अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के छात्रों की शिकायतों का समाधान किया जा सके। दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र आलोकित त्रिपाठी ने ‘न्यूज़ एजेंसी’ से कहा कि नए नियमों से महाविद्यालयों में पूरी तरह अराजकता पैदा हो जाएगी क्योंकि अब प्रमाण का बोझ पूरी तरह आरोपी पर डाल दिया जाएगा और गलत आरोप झेलने वाले छात्रों के लिए कोई सुरक्षा प्रावधान नहीं है। त्रिपाठी ने कहा, ”नए विनियम दमनकारी प्रकृति के हैं। पीड़ित की परिभाषा पहले से तय है। परिसर में पीड़ित कोई भी हो सकता है।” उन्होंने कहा, ”प्रस्तावित समानता (इक्विटी) दस्तों का मतलब परिसर के भीतर लगातार निगरानी में रहने जैसा होगा।”

त्रिपाठी ने यह भी कहा कि दिल्ली के विभिन्न महाविद्यालयों के छात्रों के इस प्रदर्शन में शामिल होने की संभावना है। यूजीसी के इन विनियमों पर देश भर में चर्चा शुरू हो गई है और कई राज्यों में छात्रों, शिक्षकों तथा सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में अधिक निष्पक्षता एवं जवाबदेही लाना है जबकि कई आलोचकों ने आशंका जताई है कि इससे सामाजिक विभाजन गहरा हो सकता है और विश्वविद्यालय परिसरों में नयी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। प्रदर्शन का आह्वान करने वाले एक पोस्टर के अनुसार, इसमें यूजीसी कार्यालय का शांतिपूर्ण घेराव किया जाएगा। पोस्टर में सामान्य वर्ग के छात्रों से विरोध प्रदर्शन में भाग लेने का आग्रह करते हुए कहा गया है, ”अभी नहीं तो कभी नहीं, एकता में शक्ति है।” सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में भी अन्य छात्रों से इसमें भाग लेने का आग्रह किया गया है और इस प्रदर्शन को अपने अधिकारों एवं चिंताओं को उठाने के लिए आवाज उठाने का एक अहम मौका बताया गया है।

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