(10 नवंबर, 2001 संबोधन पर विशेष)
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी योग्यता का लोहा उनके विरोधी भी माना करते थे। अपनी बात को सारगर्भित तरीके से रखना उनको इतना बेहतर आता था कि श्रोता चित्त लगाकर सुनते थे और प्रत्येक पक्ष द्वारा उन्हें गंभीरता से लिया जाता था। यही कारण रहा कि 10 नवंबर 2001 को जब संयुक्त राष्ट्र में भारत सरकार को अपना पक्ष रखना था, तब इसके लिए सर्व सम्मति से स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई को उपयुक्त पाया गया। भारत के विश्वास को स्वर्गीय वाजपेई जी ने निभाया भी। प्रमाण यह कि 10 नवंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 56वें सत्र में दिया गया संबोधन भारतीय कूटनीति के इतिहास में एक युगप्रवर्तक घटना साबित हुई। यह भाषण ऐसे समय में आया जब विश्व, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, 9/11 के भीषण आतंकवादी हमलों के सदमे से उबर नहीं पा रहा था। वाजपेयी जी ने इस वैश्विक त्रासदी को एक अवसर के रूप में देखा ताकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भारत द्वारा दशकों से झेले जा रहे सीमा-पार आतंकवाद की गंभीरता से अवगत कराया जा सके और आतंकवाद के विरुद्ध एक अविभाजित वैश्विक प्रतिक्रिया की मांग की जा सके। यह संबोधन न केवल भारत के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है, बल्कि यह वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट रोडमैप भी प्रस्तुत करता था। वाजपेयी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में ही आतंकवाद के खतरे को अकाट्य शब्दों में परिभाषित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद केवल कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवता के मूलभूत सिद्धांतों, सभ्य समाज की नींव और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म, भौगोलिक सीमा या राजनीतिक औचित्य नहीं हो सकता। किसी भी शिकायत या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए निर्दोष नागरिकों की हत्या करना बर्बरता है, जिसे किसी भी बहाने से स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जो राज्य, चाहे जानबूझकर या अनजाने में, आतंकवादियों को आश्रय, प्रशिक्षण, हथियार या वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं, वे भी इस अपराध में समान रूप से भागीदार हैं। यह सीमा-पार आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले तत्वों, विशेष रूप से पाकिस्तान की ओर एक सीधा और कड़ा संदेश था। भाषण का सबसे महत्वपूर्ण अंश अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से दोहरे मापदंडों को समाप्त करने का आह्वान था। वाजपेयी जी ने आगाह किया कि जब तक कुछ राष्ट्र अपने सामरिक या राजनीतिक लाभों के लिए “अच्छे” और “बुरे” आतंकवादियों के बीच भेदभाव करना बंद नहीं करते, तब तक इस खतरे को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा: “आतंकवाद को किसी भी कारण से सही नहीं ठहराया जा सकता।” उन्होंने वैश्विक सहयोग के लिए एक तीन-सूत्रीय कार्य योजना प्रस्तुत की थी। एक – आतंकवाद पर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन को शीघ्र अपनाना, जैसा कि भारत ने कई साल पहले प्रस्तावित किया दो – आतंकवादियों के लिए धन के स्रोतों, जैसे – मादक पदार्थों की तस्करी, हवाला, और अवैध व्यापार को पूरी तरह से बंद करने के लिए एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय तंत्र स्थापित करना। तीन – आतंकवादी नेटवर्क और उनकी कार्यप्रणाली को समझने और तोड़ने के लिए राष्ट्रों के बीच वास्तविक समय की खुफिया जानकारी साझा करने की आवश्यकता। वाजपेयी जी ने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत की आवाज केवल आतंकवाद पर केंद्रित न रहे, बल्कि यह एक शांतिप्रिय और विकासोन्मुख राष्ट्र की आवाज भी बने। उन्होंने परमाणु अप्रसार और वैश्विक निरस्त्रीकरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। इसके अलावा, उन्होंने विकसित और विकासशील देशों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता पर चिंता व्यक्त की और संयुक्त राष्ट्र के सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि यह 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावी बन सके। उन्होंने विकासशील देशों के लिए बेहतर व्यापार पहुँच, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और गरीबी उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों की मांग की।
वाजपेयी जी का 10 नवंबर 2001 का संबोधन, अपनी ओजस्वी भाषा, नैतिक स्पष्टता और दूरदर्शिता के कारण, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का एक अविस्मरणीय दस्तावेज है। यह न केवल उस समय की वैश्विक मनोदशा को दर्शाता है, बल्कि इसने आतंकवाद के खिलाफ भविष्य की लड़ाई के लिए भी आधारशिला रखी। यह उनके भाषण की प्रासंगिकता ही है कि आज जब देश में भाजपा नीत एनडीए सरकार काबिज है, तब देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी उन्हीं विचारों को लेकर भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जो स्वर्गीय श्री बाजपेई द्वारा संयुक्त राष्ट्र में व्यक्त किए गए थे।


